Friday, August 30, 2019

मालवीय नगर थाने में तैनात SI ने फांसी लगाकर दी जान

(mtmediadelhi.blogspot.com) दिल्ली के मालवीय नगर थाने में तैनात रहे एएसआइ सतवीर यादव ने अपने पैतृक गांव खेड़ा खुरमपुर स्थित घर के कमरे में फांसी लगा आत्महत्या कर ली। परिजनों के मुताबिक एएसआइ कई माह से मानसिक तनाव में थे, उनका इलाज गुरुग्राम स्थित पारस अस्पताल में चल रहा था। इलाज के लिए वे 18 अगस्त को अवकाश लेकर घर आए थे। सतवीर की पत्नी राजवंती ने पुलिस को बताया कि चार पांच माह से उनके पति गुमसुम रहने लगे थे। दो माह से परेशानी कुछ अधिक हो गई थी। जिसके बाद उन्हें पारस अस्पताल में दिखाया गया था। शुक्रवार की सुबह सतवीर उठे और दिनचर्या के काम करने के बाद सुबह करीब 11 बजे अपने कमरे में चले गए। परिजनों ने  समझा वे सो रहे होंगे। कुछ देर बाद पत्नी कमरे में गई तो पति को पंखे से लटका देखा। शोर मचने पर पड़ोसी व बेटे की मदद से सतवीर के शरीर को नीचे उतारा और अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने देखते ही मृत घोषित कर दिया। सतवीर को एक बेटा और बेटी है। बेटी की शादी हो चुकी है। फरुखनगर थाना पुलिस मामले की जांच कर रही है।

Thursday, August 29, 2019

विश्व की सबसे सेफ सिटी में भारत के 2 बड़े शहर

अर्थशास्त्री खुफिया इकाई (Economist Intelligence Unit) की ताजा रिपोर्ट में विश्व के सबसे सुरक्षित शहरों में भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई को 45वां तो देश की राजधानी दिल्ली को 52वां स्थान दिया गया है। सुरक्षित शहरों की सूची में इन दोनों शहरों के अलावा भारत के किसी और शहर को जगह नहीं दी गई है। वहीं, रैंकिंग में पाकिस्तान के कराची शहर को 57 स्थान हासिल हुआ है तो बांग्लादेश की राजधानी ढाका 56वें नंबर पर है।  यह रैंकिंग अर्थशास्त्री खुफिया इकाई (Economist Intelligence Unit) की सेफ सिटीज इंडेक्स (Safe Cities Index) द्वारा जारी सूची में दी गई है। बृहस्पतिवार को जारी इस सूची के मुताबिक, विश्व के 10 शहरों में 6 एशिया-पैसिफिक के हैं, जिनमें जापान की राजधानी टोक्यो को सबसे सुरक्षित शहर का दर्जा हासिल है। वहीं ओसाका को तीसरा, एम्सटर्डम को चौथा, सिडनी को पांचवां और टोरंटो को छठा स्थान मिला है,जबकि ब्रिटेन की राजधानी लंदन को 14वां दर्ज हासिल हुआ है। सूची में कुआलालंपुर को 35वां, इस्तांबुल को 36वां और रूस की राजधानी मॉस्को को 37वां स्थान मिला है। वहीं, भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश की राजधानी ढाका को 56वां और पाकिस्तान के शहर कराची को 57वां स्थान प्राप्त हुआ है।
भारत के कई शहरों के लिए झटका: जहां सुरक्षित शहरों में भारत के सिर्फ मुंबई और दिल्ली में स्थान मिला है तो इसे झटके के तौर पर भी देखा जा रहा है। इस सूची में चंडीगढ़, बेंगलुरु जैसे शहरों को कोई स्थान नहीं मिलना एक झटका माना जा रहा है। दरअसल, सेफ सिटीज इंडेक्स में मुंबई और दिल्ली के अलावा और किसी शहर को स्थान ही नहीं दिया गया है।  इन पैमानों पर हुआ शहरों को चयन: सेफ सिटीज इंडेक्स के मुताबिक, सुरक्षित शहरों की सूची जारी करते समय स्वास्थ्य, बुनियादी सुविधाएं-ढांचा, सुरक्षा समेत कुल 57 पैमानों पर शहरों को परखा गया, फिर इन्हें रैंकिंग दी गई। फिर इस आधार पर विश्व के 60 शहरों को इस सूची में शुमार किया गया।

Wednesday, August 28, 2019

'भ्रष्टाचार से लोकतंत्र की बुनियाद कमज़ोर होती है'

भ्रष्टाचार लोकतांत्रिक संस्थानों को कमज़ोर करता है, आर्थिक विकास की रफ़्तार को धीमा करता है और सरकार में अस्थिरता पैदा करने में एक भूमिका अदा करता है. ये कहना है मिरेला डम्मर फ्रेही का जो संयुक्त राष्ट्र के मादक पदार्थों और अपराध कार्यालय (यूएनओडीसी) में सिविल सोसायटी टीम लीडर हैं. उन्होंने ऊटाह के साल्ट लेक सिटी में संयुक्त राष्ट्र की सिविल सोसायटी कान्फ्रेंस में मंगलवार को ये बात कही.

सुश्री डम्मर फ्रेही ने सरकारों के बीच और सिविल सोसायटी, निजी क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की सक्रिय भागीदारी के साथ और ज़्यादा आपसी सहयोग और क़ानूनी सहायता का भी आहवान किया. मंगलवार को यूएन न्यूज़ के साथ ख़ास बातचीत में संयुक्त राष्ट्र की वरिष्ठ अधिकारी फ्रेही ने ध्यान दिलाते हुए कहा कि भ्रष्टाचार का मुक़ाबला करना टिकाऊ विकास लक्ष्यों के एजेंडा 2030 में भी अहम भूमिका में है. उनका कहना था, “भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई टिकाऊ विकास के लक्ष्य संख्या 16 में बहुत गहराई से नीहित है. इस लक्ष्य में सभी को न्याय की उपलब्धता सुनिश्चित करना और हर स्तर पर प्रभावशाली, जवाबदेह और समावेशी संस्थानों का निर्माण शामिल हैं.” उन्होंने बताया कि इस लक्ष्य के तहत एक उप-लक्ष्य है 6.15 जिसमें भ्रष्टाचार और रिश्वतख़ोरी को हर रूप में टिकाऊ तौर पर कम करने की बात कही गई है. संयुक्त राष्ट्र का मादक पदार्थों और अपराध पर कार्यालय संयुक्त राष्ट्र के भ्रष्टाचार विरोधी कन्वेंशन की देखरेख करता है. ये कन्वेंशन फिलहाल विश्व स्तर पर एक मात्र भ्रष्टाचार विरोधी दस्तावेज़ है. संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश बड़ी संख्या में इस कन्वेंशन के पक्ष हैं. इस लक्ष्य की कामयाबी को इस तरह मापा जाता है कि वार्षिक स्तर पर ऐसे लोगों और कारोबारी संस्थानों की संख्या में कितनी कमी आई जिन्होंने किसी सरकारी अधिकारी को या तो रिश्वत दी या फिर उनसे रिश्वत मांगी गई. डम्मर फ्रेही का कहना था, “भ्रष्टाचार की वैश्विक समस्या का मुक़ाबला करने के लिए एक व्यापक और सामूहिक रणनीति तैयार करने में इस कन्वेंशन के दूरगामी तरीक़े असाधारण साधन के तौर पर मौजूद हैं.” उन्होंने कहा, “जो देश इस कन्वेंशन के पक्ष हैं उनमें इस क्षेत्र में अच्छी प्रगति हुई है और उन देशों में भ्रष्टाचार विरोधी नियम व क़ानूनों में सुधार हुआ है.” डम्मर फ्रेही ने कहा कि इस क्षेत्र में प्रगति से भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई एक उच्च स्तर पर पहुँच गई है. साथ ही देशों के नियम व क़ानूनों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग व तालमेल बढ़ाने में भी मदद मिली है. 2009 में सहयोगियों द्वारा प्रगति की समीक्षा करने की एक प्रक्रिया भी शुरू की गई थी जिससे भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई की रफ़्तार बढ़ाने में मदद मिली है और इस कन्वेंशन को देशों के घरेलू क़ानूनों में शामिल कराने और उन्हें लागू कराने का काम भी आगे बढ़ा है.

सिविल सोसायटी की भागीदारी बहुमूल्य : 2001 के बाद से ही यूएनओडीसी की टीमें सिविल सोसायटी संगठनों को राष्ट्रीय अधिकारियों के साथ काम करने में ट्रेनिंग दे रही हैं. साथ ही भ्रष्टाचार विरोधी आयोजनों, संपर्क अभियानों और अन्य गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए भी सिविल सोसायटी की मदद की जा रही है. सुश्री डम्मर फ्रेही ने कहा कि भ्रष्टाचार को रोकने और इसकी मौजूदगी के बारे में जागरूकता बढ़ाने के अभियान में सिविल सोसायटी, निजी क्षेत्र और नागरिकों को सक्रिय रूप से अपनी भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित करने की ज़रूरत है. साथ ही उन्होंने भ्रष्टाचार के कारणों और इसके ख़तरों की गंभीरता के बारे में जागरूक बनाने की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया. सुश्री डम्मर फ्रेही का कहना था, “भ्रष्टाचार का ख़ात्मा करने के लिए सिविल सोसायटी और अन्य ग़ैर-सरकारी साझीदार विशेष रूप से तीन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं – एडवोकेसी, निगरानी और महारत हासिल करने के ज़रिए.” “भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अभियान के ज़रिए सिविल सोसायटी इस समस्या की नब्ज़ को गहराई से समझने के लिए ज़रूरी जानकारी हासिल कर सकती है, और उसके ज़रिए आगे भी निगरानी बेहतर की जा सकती है. इस सबके ज़रिए फिर ये सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि मानकों और ज़िम्मेदारियों का स्तर बरक़रार रखा गया है. कमियों की निशानदेही की जा सकती है और फिर स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एडवोकेसी के लिए ठोस जानकारी और सबूत मुहैया कराए जा सकते हैं.” सुश्री डम्मर फ्रेहा ने कहा कि सिविल सोसायटी और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ काम करने वाले सभी साझीदार जितनी विशेषज्ञता और महारत हासिल करेंगे उतना ही वो सरकारों को भ्रष्टाचार विरोधी कन्वेंशन और अन्य क़ानून लागू करने में मदद कर सकते हैं.


Tuesday, August 27, 2019

भारतीय पुलिस: 240 थानों में वाहन नहीं, 224 में फोन भी नहीं

भारत में पुलिस में काम करना आसान काम नहीं है. ख़ास तौर पर जब कोई निचले ओहदों पर काम कर रहा हो.यहाँ बात भारतीय पुलिस सेवा यानी 'आईपीएस' अधिकारियों की नहीं बल्कि उनके नीचे काम करने वाले आम पुलिसकर्मियों की हो रही है जिनकी ड्यूटी का न वक़्त निर्धारित है साप्ताहिक छुट्टी. ये बात 'स्टेटस ऑफ़ पोलिसिंग इन इंडिया 2019' नामक रिपोर्ट में सामने आई है जिसे लोकनीति, कॉमन कॉज और 'सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज' यानी सीएसडीएस ने गहन सर्वेक्षण के बाद तैयार किया है. सर्वेक्षण में पाया गया है कि कई अपराध सिर्फ़ इसलिए दर्ज नहीं हो रहे हैं क्योंकि पुलिस के पास जाते हुए लोग डरते हैं. अगर नाबालिग़ बच्चे किसी अपराध में पकड़े जाते हैं तो उनके साथ वयस्क अपराधियों जैसा सुलूक किया जाता है. उसी तरह महिलाओं के प्रति पुलिसवालों में संवेदनशीलता की कमी के चलते मामले दर्ज नहीं हो पा रहे हैं. इस रिपोर्ट में कई ऐसे पहलुओं पर भी चर्चा की गई है जिनकी वजह से पुलिसकर्मियों को मानसिक और शारीरिक तनाव झेलना पड़ रहा है. रिपोर्ट में कहा गया है कि पुलिसकर्मियों की ड्यूटी का समय निर्धारित नहीं होने की वजह से उन पर हमेशा तनाव रहता है. रिपोर्ट में पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय से संबंध रखने वाले पुलिसकर्मियों के बारे में कहा गया है कि उन्हें अपने ही सहकर्मियों से भेदभाव का सामना करना पड़ता है.
सिर्फ़ 6 प्रतिशत पुलिसवाले ऐसे हैं जिन्हे कार्यकाल के दौरान कोई प्रशिक्षण मिला है. बाक़ी के पुलिस वाले ऐसे हैं जिन्होंने सिर्फ़ भर्ती के वक़्त ही प्रशिक्षण मिला था. वहीं वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाता है. देश के 22 राज्यों में 70 थाने ऐसे हैं जहाँ वायरलेस उपलब्ध नहीं हैं जबकि 224 ऐसे हैं जहाँ फ़ोन की व्यवस्था भी नहीं है. 24 ऐसे हैं जहाँ न फ़ोन है न वायरलेस. लगभग 240 थाने ऐसे भी हैं जहाँ कोई वाहन उपलब्ध नहीं है. चूंकि 'क़ानून और व्यवस्था' राज्य सरकारों की ज़िम्मेदारी है इसलिए हर राज्य में पुलिसकर्मियों के सामने अलग-अलग तरह की समस्याएं आती हैं. और सबसे महत्वपूर्ण बात जो रिपोर्ट में दर्ज की गई है वो है कि ये पुलिसकर्मी इसके ख़िलाफ़ आवाज़ भी नहीं उठा सकते हैं. वर्ष 2015 के मई महीने में बिहार की गृह रक्षा वाहिनी के 53 हज़ार कर्मियों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल की थी. वहीं साल 2016 के जून महीने में कर्नाटक के पुलिसकर्मियों ने कम वेतन, ड्यूटी का समय तय ना होने, साप्ताहिक छुट्टी नहीं मिलने को लेकर आंदोलन की धमकी दी थी.
सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तनाव का असर पुलिसकर्मियों के रवैये पर भी पड़ रहा है. दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में इस रिपोर्ट को औपचारिक रूप से जारी किया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस चेलमेश्वर के अलावा उत्तर प्रदेश पुलिस और केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के पूर्व महानिदेशक प्रकाश सिंह भी मौजूद थे. इसके अलावा सामजिक कार्यकर्ता वृंदा ग्रोवर और अरुणा रॉय भी थीं. जब-जब पुलिस बल में सुधार की बात आती है तो प्रकाश सिंह का नाम आता है, जिन्होंने इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था. वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने सुधारों को लेकर एक अहम फ़ैसला सुनाया था. बीबीसी से बात करते हुए प्रकाश सिंह का कहना था कि भारत में पुलिस बल की जो संरचना है या फिर जो अनुसंधान का तरीक़ा है वो औपनिवेशिक है.
हलांकि वो कहते हैं कि सुधारों की बात नई नहीं है. वर्ष 1902 में लार्ड कर्ज़न ने भी सुधारों की पेशकश की थी. उनका मानना है कि क़ानून के पालन की बजाय पुलिसकर्मी हुक्मरानों के आदेश का पालन करने में ही अपनी बेहतरी समझते हैं. 'सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज' यानी सीएसडीएस और 'कॉमन कॉज' नमक ग़ैर सरकारी संस्था की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि महाराष्ट्र ही एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक अवकाश मिल रहा है. ओडिशा और छत्तीसगढ़ के 90 प्रतिशत पुलिसकर्मी ऐसे हैं जिन्होंने शोधकर्ताओं को बताया कि उन्हें एक दिन भी साप्ताहिक अवकाश नहीं मिलता और वो लगातार काम करने को मजबूर हैं.
काम करने के घंटों की अगर बात की जाए तो पूरे भारत में औसतन एक पुलिसकर्मी एक साथ 14 घंटे काम करने को मजबूर है जबकि पंजाब और ओडिशा में पुलिसकर्मियों ने बताया है कि वो एक साथ 17 से 18 घंटों तक काम कर रहे हैं. इसमें अपने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के लिए घरेलू काम करने की भी शिकायत शोधकर्ताओं को मिली है. ये तो बात मानसिक तनाव और ड्यूटी के घंटों के निर्धारण नहीं होने की बात, जहाँ तक अपराध अनुसंधान और प्रशिक्षण का मामला है तो भारत इसमें भी काफ़ी पीछे है. रिपोर्ट में राजस्थान, ओडिशा और उत्तराखंड को 'वर्स्ट परफ़ॉर्मिंग स्टेट्स' के रूप में चिह्नित किया गया है.पश्चिम बंगाल, गुजरात और पंजाब पूरे देश में सबसे बेहतर हैं. चाहे वो बेहतर संरचना हो या फिर बेहतर संसाधन और आधुनिकीकरण की बात हो. प्रकाश सिंह ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया मगर सरकार ने समय-समय पर पुलिस सुधारों को लेकर कमिटियां और आयोगों का गठन किया था. इसमें राष्ट्रीय पुलिस आयोग, राज्य पुलिस आयोग के अलावा पुलिस प्रशिक्षण पर गोरे कमिटी, रिबेरो कमेटी पद्मनाभैया कमिटी और मालीमठ कमिटी शामिल हैं. लेकिन इन सब के बावजूद जो सुधार पुलिस के अमल में दिखने चाहिए थे वो नहीं दिख पाए. जस्टिस चेलमेश्वर कहते हैं कि 'एक पुलिसकर्मी को कई काम करने पड़ते हैं. जैसे किसी विशिष्ठ व्यक्ति के सुरक्षा ही देखना, प्रदर्शनों से भी निपटना, हिंसा से निपटना और तब जाकर अनुसंधान भी उसके ज़िम्मे आता है.'
अनुसंधानकर्ता पुलिस अधिकारियों को प्रशिक्षण के अभाव में पता ही नहीं है कि अदालत में मामला कैसे पक्ष किया जाए या प्राथमिकी किस तरह दर्ज की जाए. वैसे रिपोर्ट में इस बात पर भी चिंता व्यक्त की गई है कि अपराध के बदलते तरीक़ों से निपटने के लिए भारत उतना सक्षम है या नहीं जैसे आर्थिक अपराध, डेटा की चोरी, साइबर अपराध की भी चर्चा की गई है. पुलिस विभाग को मुहैया कराए गए संसाधन हों या पुलिस आधुनिकीकरण के मुद्दे पर भी भारत काफ़ी पीछे ही है. लेकिन सबसे बड़ी चुनौती है पुलिस बल की कमी. कई राज्य ऐसे हैं जहाँ पुलिस बल में रिक्तियां तो हैं मगर उन पर बहाली नहीं हुई है. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, एक लाख की जनसंख्या पर 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए जबकि भारत में इसका अनुपात सिर्फ 192 प्रति एक लाख व्यक्ति है. रिपोर्ट में पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो की 2007 से लेकर 2016 तक के डेटा का भी उल्लेख किया गया है. नगालैंड को छोड़कर बाक़ी के सभी राज्यों में पुलिस बल की भारी कमी है, जिसमें उत्तर प्रदेश का हाल सबसे ख़राब है. रिपोर्ट में उन पदों का भी ज़िक्र किया गया है जो पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित किए गए हैं और उन पर बहालियां नहीं हो रहीं हैं. उसी तरह अल्पसंख्यकों का अनुपात भी पुलिस बल में काफ़ी कम है 'स्टेटस ऑफ़ पोलिसिंग इन इंडिया 2019' यानी 'एसआईपीआर' की रिपोर्ट के निचोड़ में उल्लेख किया गया है कि आम नागरिकों के मन में पुलिस का ख़ौफ़ सबसे ज़्यादा है. बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली

अब ATM से ₹10,000 से ज्यादा कैश निकालने पर भरना होगा OTP

आरबीआई के निर्देश के बाद अब एटीएम फ्रॉड रोकने के लिए बैंकों ने कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। केनरा बैंक ने कार्ड के जरिए 10,000 रुपये से ज्यादा की रकम एटीएम से निकालने पर पिन नंबर के साथ वन टाइम पासवर्ड (ओटीपी) जरूरी कर दिया है। इसका मतलब है कि अगर केनरा बैंक का कोई भी ग्राहक एटीएम से 10, 000 रुपये से ज्यादा निकालेगा तो उसे एटीएम पिन नंबर के साथ ओटीपी भी भरना होगा।  सूत्रों के अनुसार, अब अन्य बैंक भी केनरा बैंक को फॉलो कर सकते हैं और एटीएम से 10,000 रुपये से ज्यादा कैश निकालने पर ओटीपी अनिवार्य कर सकते हैं। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, आरबीआई के निर्देश का सभी बैंकों को पालन करना होगा। आरबीआई ने स्पष्ट रूप से कहा है कि एटीएम फ्रॉड रोकना होगा। एटीएम फ्रॉड रात 11 बजे से सुबह 6 तक ज्यादा होते हैं। 

इससे पहले एटीएम धोखाधड़ी को रोकने के लिए दिल्ली स्टेट लेवल बैंकर्स कमिटी (SLBC) ने कुछ उपाय सुझाए थे। कमिटी ने 2 एटीएम ट्रांजैक्शन के बीच में 6 से 12 घंटे का समय रखने का सुझाव दिया था। साल 2018-19 के दौरान दिल्ली में 179 एटीएम फ्रॉड केस दर्ज किए गए। इस मामले में दिल्ली, महाराष्ट्र से (233 एटीएम धोखाधड़ी के मामले) केवल कुछ कदम ही दूर है। हाल के महीनों में कार्ड की क्लोनिंग के मामले भी सामने आए हैं जिसमें बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक शामिल थे। साल 2018-19 में देशभर में फ्रॉड के मामले बढ़कर 980 हो गए, इससे पहले साल इन मामलों की संख्या 911 थी। 

Monday, August 26, 2019

बटला हाउस के मुरादी रोड पिछले 6 महीने से बहुत बुरी हालत

ओखला विधानसभा के बटला हाउस के मुरादी रोड पिछले 6 महीने से बहुत बुरी हालत में है, स्थानिय लोग प्रशासन की उदासीनता से परेशान है, रोड टूटा हुआ व गड्ढों में पानी भरा है लोग चोटिल हो रहे हैं, लोग कहते कहते थक गय विधायक सुनते ही नही, सम्बंधित अधिकारी इस ओर ध्यान दे,

Saturday, August 24, 2019

बीजेपी के लिए ‘अशुभ’ हुआ अगस्त, अटल से लेकर अरुण तक का निधन

पूर्व वित्तमंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली का शनिवार को 66 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. ये तारीख है 23 अगस्त. इसी के साथ ये बात भी चल निकली है कि बीजेपी के लिए अगस्त का महीना काफी खराब रहा है. पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेताओं का निधन इस महीने में हुआ है. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का निधन पिछले साल की 16 अगस्त को हुआ था. बीजेपी की राजनीति में सबसे बड़े वट वृक्ष की हैसियत रखने वाले अटल के निधन से अशुभ अगस्त की शुरुआत हुई थी. 2019 में ये आंकड़ा बढ़ गया. इस साल का अगस्त भी बीजेपी के लिए अशुभ रहा. 6 अगस्त को बीजेपी का एक और स्तंभ रहीं पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसार से विदा ली. उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में जन्मे और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे बीजेपी नेता बाबूलाल गौर का निधन 21 अगस्त 2019 को हो गया था. इतने नेताओं के बाद अब अरुण जेटली का जाना, ऐसे में अगस्त के अशुभ होने की बात बीजेपी के लिए उठना स्वाभाविक है.

हौजरानी प्रेस एन्क्लेव में बन सकता है फ्लाईओवर: 50 हजार से ज्यादा लोगों को जाम से मिलेगा छुटकारा

दिल्ली वालों को बड़ी राहत मिलने वाली है। साकेत मैक्स अस्पताल के बाहर पंडित त्रिलोक चंद शर्मा मार्ग पर लगने वाले जाम से जल्द मुक्ति मिलेगी। प...