Friday, June 5, 2020

भूकंप के इतने झटके दिल्ली-एनसीआर में क्यों आ रहे?

भारत के दिल्ली-एनसीआर इलाक़े में इस साल की 12 अप्रैल और तीन मई के बीच में नेशनल सेंटर ऑफ़ सीसमोलोजी ने भूकंप के 7 झटके रिकार्ड किए. इनमें से किसी भी झटके की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 4 से ज़्यादा की नहीं थी और जानकरों को लगता है कि 5 से कम तीव्रता वाले भूकंप के झटकों से बड़ा नुक़सान नहीं होने की सम्भावना प्रबल रहती है. इस बीच दो सवाल ज़रूर उठ रहे हैं. पहला ये कि आख़िर दिल्ली-एनसीआर में भूकंप के झटकों के वाक़ये बढ़ क्यों रहे हैं और क्या भविष्य के लिए ये बड़ी चिंता का विषय बन सकता है लेकिन सबसे पहले इस बात को समझने की ज़रूरत है कि भारत में भूकंप की क्या आशंकाएं हैं. भूगर्भ विशेषज्ञों ने भारत के क़रीब 59% भू-भाग को भूकंप सम्भावित क्षेत्र के रूप में वर्गित किया है.
दुनिया के दूसरे देशों की तरह ही भारत में ऐसे ज़ोन रेखांकित किए गए हैं जिनसे पता चलता है कि किस हिस्से में सीस्मिक गतिविधि (पृथ्वी के भीतर की परतों में होने वाली भोगौलिक हलचल) ज़्यादा रहती हैं और किन हिस्सों में कम. वैज्ञानिकों ने इसका तरीक़ा निकाला है भूकंप सम्भावित क्षेत्रों के चार-पाँच सीस्मिक ज़ोन बना कर उन्हें चिन्हित करना. ज़ोन-1 में भूकंप आने की आशंका सबसे कम रहती है वहीं ज़ोन-5 में ज़्यादा प्रबल रहती है. दिल्ली-एनसीआर का इलाक़ा सीस्मिक ज़ोन-4 में आता है और यही वजह है कि उत्तर-भारत के इस क्षेत्र में सीस्मिक गतिविधियाँ तेज़ रहती हैं. जानकार सीस्मिक ज़ोन-4 में आने वाले भारत के सभी बड़े शहरों की तुलना में दिल्ली में भूकंप की आशंका ज़्यादा बताते हैं. ग़ौरतलब है कि मुबई, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहर सिस्मिक ज़ोन-3 की श्रेणी में आते हैं. जबकि भूगर्भशास्त्री कहते हैं कि दिल्ली की दुविधा यह भी है कि वह हिमालय के निकट है जो भारत और यूरेशिया जैसी टेक्टॉनिक प्लेटों के मिलने से बना था और इसे धरती के भीतर की प्लेटों में होने वाली हलचल का ख़मियाज़ा भुगतना पड़ सकता है. 'इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ स्ट्रक्चरल इंजीनियर्स' के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर महेश टंडन को लगता है कि दिल्ली में भूकंप के साथ-साथ कमज़ोर इमारतों से भी ख़तरा है.
उन्होंने कहा, "हमारे अनुमान के मुताबिक़ दिल्ली की 70-80% इमारतें भूकंप का औसत से बड़ा झटका झेलने के लिहाज़ से डिज़ाइन ही नहीं की गई हैं. पिछले कई दशकों के दौरान यमुना नदी के पूर्वी और पश्चिमी तट पर बढ़ती गईं इमारतें ख़ास तौर पर बहुत ज़्यादा चिंता की बात है क्योंकि अधिकांश के बनने के पहले मिट्टी की पकड़ की जाँच नहीं हुई है". भारत के सुप्रीम कोर्ट ने चंद वर्षों पहले आदेश दिया था कि ऐसी सभी इमारतें जिनमें 100 या उससे अधिक लोग रहते हैं, उनके ऊपर भूकंप रहित होने वाली किसी एक श्रेणी का साफ़ उल्लेख होना चाहिए. फ़िलहाल तो ऐसा कुछ देखने को नहीं मिलता. दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र की एक बड़ी समस्या आबादी का घनत्व भी है. डेढ़ करोड़ से ज़्यादा आबादी वाले दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में लाखों इमारतें दशकों पुरानी हो चुकी हैं और तमाम मोहल्ले एक दूसरे से सटे हुए बने हैं.
भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार दिल्ली और उत्तर भारत में छोटे-मोटे झटके या आफ्टरशॉक्स तो आते ही रहेंगे लेकिन जो बड़ा भूकंप होता है उसकी वापसी पाँच वर्ष में ज़रूर होती है और इसीलिए ये चिंता का विषय है. वैसे भी दिल्ली से थोड़ी दूर स्थित पानीपत इलाक़े के पास भूगर्भ में फॉल्ट लाइन मौजूद है जिसके चलते भविष्य में किसी बड़ी तीव्रता वाले भूकंप की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ हिमालयन टेक्नोलोजी के प्रमुख भूगर्भशास्त्री डॉक्टर कालचंद जैन मानते हैं कि, "किसी बड़े भूकंप के समय, स्थान और रिक्टर पैमाने पर तीव्रता की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती".
लेकिन उन्ही के मुताबिक़, "हम इस बात को भी कह सकते हैं कि दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में सीस्मिक गतिविधियाँ सिलसिलेवार रहीं हैं और वे किसी बड़े भूकंप की भी वजह हो सकती हैं". भूकंप और सीस्मिक ज़ोन से जुड़ी एक और अहम बात है कि किसी भी बड़े भूकंप की रेंज 250-350 किलोमीटर तक हो सकती है. मिसाल के तौर पर 2001 में गुजरात के भुज में आए भूकंप ने क़रीब 300 किलोमीटर दूर स्थित अहमदाबाद में भी बड़े पैमाने पर तबाही मचाई थी. अगर दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में पिछले 300 वर्षों के भूकंप इतिहास को टटोला जाए तो सबसे ज़्यादा तबाही मचाने वाला भूकंप 15 जुलाई, 1720 का बताया जाता है.
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के पूर्व सहायक महानिदेशक डॉक्टर प्रभास पांडे ने इस मामले पर वर्षों तक रिसर्च करके अपने स्टडी में इसका ज़िक्र किया है. उनके अनुसार, "1720 वाले भूकंप की तीव्रता का अंदाज़ा 1883 में प्रकाशित हुए 'द ओल्डहैम्स कैटालॉग ऑफ़ इंडियन अर्थक्वेक्स' से मिलता है और रिक्टर पैमाने पर ये 6.5-7.0 के बीच का रहा था. इसने पुरानी दिल्ली और अब नई दिल्ली इलाक़े में भारी तबाही मचाई थी और भूकंप के पाँच महीनों बाद तक हल्के झटके महसूस किए गए थे".
डॉक्टर प्रभास पांडे आगे लिखते हैं, "अगर 20वीं सदी की बात हो तो 1905 में काँगड़ा, 1991 में उत्तरकाशी और 1999 में चमोली में आए भूकंप उत्तर भारत में बड़े कहे जाएँगे और इनके कोई न कोई जुड़ाव पृथ्वी के बीचे वाली गतिविधियों से रहा है जो एक ही समय पर दिल्ली-एनसीआर में भी महसूस की गईं हैं" सवाल यह भी है कि दिल्ली भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए कितनी तैयार है.
सार्क डिज़ास्टर मैनेजमेंट सेंटर के निदेशक प्रोफ़ेसर संतोष कुमार को लगता है कि पहले की तुलना में अब भारत ऐसी किसी आपदा से बेहतर निपट सकता है. उन्होंने बताया, "देखिए आशंकाएं सिर्फ़ अनुमान पर आधारित होती हैं. अगर हम लातूर में आ चुके भूकंप को ध्यान में रखें तो निश्चित तौर पर दिल्ली में कई भवन असुरक्षित हैं. लेकिन बहुत सी जगह सुरक्षित भी हैं. सबसे अहम है कि हर नागरिक ऐसे ख़तरे को लेकर सजग रहे और सरकारें प्रयास करें कि नियमों का उल्लंघन क़त्तर्ई न हो."
'सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट' की अनुमिता रॉय चौधरी का भी मानना है कि दिल्ली में हज़ारों ऐसी इमारतें हैं जिनमें रेट्रोफ़िटिंग यानी भूकंप निरोधी मरम्मत की सख़्त ज़रूरत है. उन्होंने कहा, "भारत के कई हिस्सों से इमारतों के ज़मीन में धसने की ख़बरें आती रहती हैं और वो भी बिना भूकंप के. अब चूँकि दिल्ली-एनसीआर का इलाक़ा पहले से ही यमुना नदी के दोआब पर फैलता गया है तो ज़ाहिर है बड़े भूकंप को झेल पाने की क्षमता भी कम होगी. ज़रूरत पुरानी इमारतों की पूरी मरम्मत करके, सभी नई इमारतों को कम से कम 7.0 रिक्टर स्केल की तीव्रता वाले भूकंप को झेलने वाला बनाने की है." बीबीसी संवाददाता

 
 

Monday, June 1, 2020

Delhi University Exams 2020: फाइनल ईयर के स्टूडेंट्स को देने होंगे ओपन बुक एग्जाम

दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) ने फाइनल ईयर के स्टूडेंट्स के लिए ओपन बुक एग्जामिनेशन (Open Book Exams) आयोजित कारने का फैसला लिया है. ओपन बुक एग्जामिनेशन (OBE) के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी ने ऑफिशियल वेबसाइट पर गाइडलाइन्स जारी कर दी हैं. नोटिफिकेशन को देखने के लिए इच्छुक उम्मीदवार ऑफिशियल वेबसाइट du.ac.in पर लॉग इन कर सकते हैं. दरअसल, कोरोनावायरस (Coronavirus) के प्रकोप के चलते परीक्षाएं आयोजित कराना संभव नहीं हैं. स्टूडेंट्स की पढ़ाई और अकेडमिक कैलेंडर को ध्यान में रखते हुए दिल्ली यूनिवर्सिटी ने इस बार फाइनल ईयर के स्टूडेंट्स के लिए ओपन बुक एग्जामिनेशन आयोजित कराने का निर्णय लिया है. हालांकि, ज्यादातर स्टूडेंट्स और शिक्षक इस तरह से परीक्षाएं आयोजित कराने का विरोध कर रहे हैं. लेकिन सभी विरोधों के बीच दिल्ली यूनिवर्सिटी ने एग्जाम के लिए  गाइडलाइन्स जारी कर दी हैं. इससे ये साफ हो गया है कि फाइनल ईयर के स्टूडेंट्स को इस बार ओपन बुक एग्जामिनेशन ही देने होंगे. परीक्षाएं 1 जुलाई से आयोजित की जाएंगी.  
Delhi University Exams 2020: ये हैं गाइंडलाइन्स
1. OBE के लिए परीक्षार्थी को पूरे समय के लिए नेट के माध्यम से ऑनलाइन रहने की आवश्यकता नहीं होगी. बल्कि परीक्षार्थी को केवल प्रश्नपत्र डाउनलोड करने व उत्तर-पुस्तिकाओं को अपलोड करने के लिए ही इंटरनेट व हार्डवेयर ( जैसे- लैपटॉप, डेस्कटॉप, स्मार्ट फ़ोन आदि ) की ज़रूरत होगी. स्टूडेंट्स को प्रश्नों के उत्तर घर में ही ख़ाली शीट्स पर लिखकर उन्हें अपलोड करना होगा. 2. परीक्षा के लिए कुल समय सीमा तीन घंटे मिलेगी, जिसमें परीक्षा लिखने के लिए दो घंटे का समय दिया जाएगा. वहीं, एक घंटे का समय उत्तर-पुस्तिका को अपलोड करने के लिए होगा. दिव्यांग वर्ग के विद्यार्थियों के लिए कुल समय 5 घंटे का मिलेगा. 3. जिनके पास ऑनलाइन परीक्षा सम्बन्धी संसाधनों की सुविधा नहीं है, उनको इलेक्ट्रॉनिक्स व इंफॉर्मेशन टेक्नोलोजी मंत्रालय के देश भर में बने कॉमन सर्विस सेंटर की सहायता से विश्विद्यालय सुविधा मुहैया कराएगा. तकनीकी रूप से सुविधाविहीन विद्यार्थी अपना पंजीकरण करवाकर वहां से सुविधा ले सकते हैं. इससे संबंधित जानकारी कुछ दिनों बाद विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर उपलब्ध कराई जाएगी.4. OBE के लिए विद्यार्थियों को एक प्रैक्टिस सेशन भी दिया जाएगा, इसमें विद्यार्थी मॉक एग्ज़ाम दे सकेंगे. इसकी व्यवस्था परीक्षा शुरू होने से एक हफ़्ते पहले शुरू की जाएगी.5. ओपन बुक एग्जामिनेशन में शामिल होने वाले उम्मीदवार अगर अपनी परफॉर्मेंस में सुधार करना चाहते हैं तो उन्हें सेमेस्टर साइकिल के मुताबिक सुधार करने का मौका दिया जाएगा. 6. सभी छात्र इस बात को सुनिश्चित करें कि उनके द्वारा संबंधित पाठ्यक्रमों के लिए परीक्षा फॉर्म पहले ही भरे जा चुके हैं. 7. कॉलेज परीक्षा से पहले कुछ टेलीफोन नंबर जारी करेंगे. किसी भी तरह की जरूरत पड़ने या किसी भी जानकारी को पाने के लिए स्टूडेंट्स उन नंबरों का उपयोग कर सकेंगे. 8. एग्जाम के लिए टेंटेटिव शेड्यूल यूनिवर्सिटी की ऑफिशियल वेबसाइट पर जारी किया जा चुका है. स्टूडेंट्स वेबसाइट से शेड्यूल चेक कर सकते हैं और किसी भी तरह की समस्या होने पर ई-मेल के जरिए एग्जामिनेशन ब्रांच से पता कर सकते हैं. 9. अगर परीक्षा के दौरान किसी समस्या के कारण स्टूडेंट्स पोर्टल पर अपनी आंसर शीट्स अपलोड नहीं कर पाते हैं तो वे आंसर शीट की पीडीएफ फाइल जारी की गई ई-मेल आईडी पर भेज सकते हैं. इस विकल्प का इस्तेमाल सिर्फ एमरजेंसी में ही किया जा सकता है. 10.  विद्यार्थियों के भविष्य और हितों को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय की पूरी कोशिश रहेगी कि OBE रिजल्ट जुलाई के अंत तक जारी कर दिया जाए. 

Sunday, May 31, 2020

डिजिटल स्पेस को रियल स्पेस बनाने की ज़रूरत-सुमन कुमार

दिल्ली: समय के अनुसार अब डिजिटल स्पेस को रियल स्पेस बनाने की आवश्यकता है इसी के साथ, नगर स्तर से लेकर, एकेडमिक संस्थानो, कॉरपोरेट सेक्टर के साथ संस्कृति संस्थानो को आगे आकर कलाओं को स्पॉन्सर करना चाहिए, और इसके लिए कलाकारों को भी एक अप्रोच  डेवलप करनी पड़ेगी, यह बात  प्रख्यात रंगकर्मी एवं संगीत नाटक अकादमी  के डिप्टी सेकेट्री (ड्रामा) श्री सुमन कुमार ने प्रासंगिक द्वारा आज दोपहर आयोजित 'डिजिटल प्लेटफार्म पर रंगकलाओं के अर्थतंत्र' की परिचर्चा के दौरान कही। सुमन कुमार जी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि डिजिटल स्पेस के अनुसार कलाकारों को अब छोटी और रोचक प्रस्तुतियां तैयार करने के साथ उसकी मार्केटिंग करना भी सीखने की आवश्यकता पर बल दिया, परिचर्चा में यह भी निकल कर आया कि आर्ट के लिए अमेजॉन या नेटफ्लिक्स जैसे चैंनल बनने के साथ कलाकर्मियों का CINTA या SWA जैसा एक राष्ट्रीय स्तर का संगठन भी बनना चाहिए । उनकी इस बात से परिचर्चा में शामिल प्रसिद्ध लेखक एवं रंगनिदेशक श्री नज़ीर कुरैशी, प्रख्यात रंगकर्मी श्री रामचन्द्र सिंह, प्रसिद्ध नृत्यांगना प्रतिभा सिंह, गायक एवं संगीतकार श्री नवनीत पांडेय, वरिष्ठ रंगकर्मी श्री बृजेश अनय, श्री  सौरभ कौशिक, श्री शैलेन्द्र द्विवेदी, श्री बृजेश मिश्रा, श्री शिव पटेल आदि सभी ने सहमति व्यक्त की। क़रीब ढाई घण्टे चली इस डिजिटल चर्चा में मुख्य वक्ता सुमन जी सहित सभी लोगों का हार्दिक आभार व्यक्त करते हुए संस्था के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ रंगकर्मी आलोक शुक्ला ने जून में जल्द ही पुनः आयोजित नाट्य पाठ में आने का आग्रह किया।  रिपोर्ट@WJI सोशल मीडिया

Tuesday, May 19, 2020

मजदूरों का दर्द: फुरकान शाह

मजदूर घरों को लौट रहे हैं। भूख, लाचारी, गरीबी, अभाव, तिरस्कार, अवहेलना, भय, अनिश्चितता या अपनों से दूरी। कारण जो भी हो आज इनका मुख्य उद्देश्य अपने उसी घर को लौट जाना है जिसको छोड़कर रोजी रोटी की तलाश में निकले थे। शहरों की चकाचौंध ने गाँव में अंधेरे पसार दिए हैं। खण्डहरों में तबदील होते गाँव वर्षों से बुद्धिजीवियों की चिंता का विषय बने हुए हैं। शहरों में भी चुनौतियाँ कम नहीं हैं किन्तु भौतिक सुख की चाहत ने ग्रामीणों को गाँव का स्वर्ग जैसा सुख छोड़कर शहरों में नारकीय जीवन जीने को मजबूर कर दिया है। आज जब घर या गाँव लौटने का समय आया तो लगता है कि समूचा भारत उमड़ पड़ा हो। लोग देखकर हैरान है कि इतनी बड़ी संख्या में लोग इधर उधर हैं। ये सब एकाएक नहीं हुआ है बल्कि पलायन में सदियाँ लगीहैं। इन्हें दोबारा स्थापित होने में भी लंबा समय लगेगा। लोग आज हर अव्यवस्था के लिए सरकार को दोषी ठहराते हैं क्या लोगों का खुद का कोई दोष नहीं जो विकास के मुद्दों को न देखकर सिर्फ धर्म और जाति के नाम पर वोट देते रहे। और जनता के सेवक जो चुनाव के दौरान प्रत्येक घर तक पहुंचने की कोशिश करते हैं, चुनाव जीतने के बाद पांच साल तक और पांच ही क्या जिंदगी भर मोटा वेतन और पेंशन, भत्ते प्राप्त कर मौज की ज़िन्दगी गुजारते हैं ये देखने की जहमत तक नहीं उठाते कि उनके क्षेत्र में लोगों की समस्याएं क्या हैं। याद आती हैं उन राजाओं की कहानियां जो भेष बदलकर घूमते थे। जो अपनी प्रजा के दुख को अपना दुख समझते थे। आज जब देश में त्राहि त्राहि मची हुई है, निर्धन और मध्यम वर्ग के माथे पर चिंता की लकीरें हैं तमाम राजनैतिक पार्टियाँ इसे भी एक अवसर के रूप में देख रही हैं। देखें लेकिन इन गरीबों के बारे में सोचना होगा। इन्हें गले लगाना होगा। स्थानीय लोगों को काम मिले इसके लिए प्रत्येक स्तर पर दबाव बनाना होगा। सिर्फ सरकारी दफ्तरों में बैठे ,सरकारी वेतन ले रहे लोग और धनी वर्ग ही प्रजा नहीं है प्रजा वो भी है जिसका किसी सरकारी सहायता वाले दफ्तर में नाम नहीं किन्तु चुनाव के समय बड़ी आस से तुम्हें वोट देते हैं। # फुरकान शाह, प्रबन्धक, शाहजहाँ पब्लिक स्कूल याकूबपुर अमरोहा यूपी 

Wednesday, May 13, 2020

PM Modi ने दिए 20 लाख करोड़ : आबादी के हिसाब से आपके हिस्से में कितना आया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस की वजह से लॉकडाउन झेल रहे देश की आर्थिक हालत सुधारने के लिए 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज का ऐलान किया है. इस पैकेज की पूरी जानकारी आज वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण शाम 4 बजे देंगी. माना जा रहा है कि वित्त मंत्री यह बताएंगी कि इस पूरे पैकेज में किस सेक्टर तो कितना दिया गया है. वहीं मंगलवार को पीएम मोदी ने कहा कि इस पैकेज का इस्तेमाल देश के हर वर्ग किसान, मजदूर, लघु उद्योगों और कामगारों की मदद के लिए मदद किया जाएगा. पीएम मोदी ने यह भी कहा कि कोरोना वायरस की वजह से देश की आर्थिक गतिविधियों को ज्यादा नहीं रोका जा सकता है. अब हमें दो गज की दूरी और तमाम दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए इसके साथ ही रहना सीखना होगा. उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस से जंग अभी लंबी चलने वाली है. फिलहाल पीएम मोदी के 20 लाख करोड़ के पैकेज के ऐलान के बाद लोगों के मन में चार सवाल हैं जिसे वे जानना चाहते हैं. 
आपके हिस्से में कितने: अगर भारत की आबादी 133 करोड़ (1,33,00,00,000 - 133 के बाद सात शून्य) मानी जाए, तो इस हिसाब से हर एक के हिस्से में 15,037.60 रुपये आएंगे. अगर आबादी 130 करोड़ (1,30,00,00,000 - 13 के बाद आठ शून्य) मानी जाए, तो इस हिसाब से हर एक के हिस्से में 15,384.60 रुपये आएंगे. हालांकि यह एक बात साफ कर दें कि यह आर्थिक प्रति व्यक्ति के हिसाब से नहीं बांटा जाएगा, ऐसा कोई प्रावधान नहीं है.
20 लाख करोड़ में कितने जीरो: पीएम मोदी ने के 20 लाख करोड़ के पैकेज पर कई लोग यह भी जानने की कोशिश कर रहे हैं कि यह कुल कितनी रकम है और इसमें कितने शून्य आते हैं. इस सवाल पर कॉमेडियन कुणाल कामरा ने बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा पर तंज भी कसा है. आपको हता दें कि 20 लाख लाख करोड़ को अगर संख्या यानी नंबरों में बदलें तो 20000000000000 होगा. देश की कुल जीडीपी का कितना : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना वायरस महामारी के कारण लड़खड़ाई अर्थव्यवस्था को फिर से मजबूती देने के लिये 20 लाख करोड़ रुपये के जिस प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा मंगलवार को की वह दुनिया में विभिन्न देशों द्वारा अब तक घोषित बड़े आर्थिक पैकेजों में से एक है. प्रधानमंत्री ने बताया कि 20 लाख करोड़ रुपये का यह पैकेज देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 10 प्रतिशत के बराबर होगा. इस लिहाज से यह कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे देशों द्वारा घोषित बड़े पैकेजों में सुमार हो गया है. क्या होता है जीडीपी: सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) एक निश्चित समय में देश के अंदर बनने वाली सभी तैयार वस्तुओं और सेवाओं की कीमत या मौद्रिक मूल्य को जीडीपी कहा जाता है. जीडीपी में  निजी और सार्वजनिक उपभोग, निवेश, सरकारी खर्च, निजी आविष्कार, भुगतान-निर्माण लागत और व्यापार का विदेशी संतुलन शामिल है. जीडीपी एक तरह की आर्थिक सेहत के स्थिति जानने का पैमाना होता है.

Monday, May 11, 2020

ट्रेन चलने से 90 मिनट पहले पहुंचना होगा स्टेशन, रेलगाड़ी में सफर करने को लेकर RPF के विशेष निर्देश

कोरोनावायरस लॉकडाउन के बीच रेल मंत्रालय की कल (मंगलवार) से रेल सेवाओं को फिर से शुरू करने की योजना है. रेल मंत्रालय ने रविवार को कहा कि उसकी योजना चरणबद्ध तरीके से ट्रेनों को चलाने की है. इस बीच रेलवे सुरक्षा बल ने यात्रियों के कुछ विशेष निर्देश दिए हैं. आरपीएफ के महानिदेशक अरुण कुमार ने कहा, "यात्रियों से ट्रेन के निकलने के समय से 90 मिनट पहले रेलवे स्टेशन पर पहुंचने के लिए कहा जायेगा." कुमार ने कहा कि यात्रियों को स्टेशन के अंदर आने से पहले थर्मल स्क्रीनिंग से गुजरना होगा. साथ ही रेलवे यात्रियों से यात्रा के दौरान थोड़ा-बहुत सामान ले जाने का आग्रह करेगा. ट्रेन में यात्रा करने को लेकर पहले भी कुछ निर्देश जारी किए गए हैं. इसके तहत, ऐसे यात्री जो बुखार आदि से पीड़ि‍त है, यह यात्रा नहीं कर सकेंगे. इसके अलावा जिस यात्री में कोरोना वायरस के कोई भी लक्षण पाए जाएंगे, उसे यात्रा की इजाजत नहीं दी जाएगी.  रविवार को रेल मंत्रालय ने कोरोना वायरस लॉकडाउन के मद्देनदर बंद रेल सेवाओं को फिर से शुरू करने की घोषणा की थी. इसके तहत मंगलवार (12 मई) से ट्रेनों को चरणबद्ध तरीके से चलाने की योजना है. 
भारतीय रेलवे ने रविवार शाम को यह सूचना दी थी कि 12 मई से 15 जोड़ी ट्रेनें चलाई जाएंगी. रेलवे की तरफ से जारी प्रेस रिलीज के अनुसार इस दौरान नई दिल्ली स्टेशन से डिब्रूगढ़, अगरतला, हावड़ा, पटना, बिलासपुर, रांची, भुवनेश्वर, सिकंदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, तिरुवनंतपुरम, मडगांव, मुंबई सेंट्रल, अहमदाबाद और जम्मू तवी को जोड़ने वाली इन ट्रेनों को विशेष ट्रेनों के रूप में चलाया जाएगा. इन ट्रेनों के लिए आज शाम 4 बजे से IRCTC से बुकिंग की जा सकेगी. इन ट्रेनों में सिर्फ एसी कोच होंगे.

Monday, May 4, 2020

स्पेशल स्टोरी: 350 साल पहले खुद को क्वरांटाइन करने वाले गांव की कहानी!

क्वरांटाइन...! हमारी देसी डिक्शनरी में अब यह शब्द नया नहीं रह गया है. क्वरांटाइन का मतलब बच्चा-बच्चा जानता है. खुद को घर में कैद कर लेना, समाज से दूरी बना लेना, खुद में खुद को समेंट लेना..बस यही तो क्वरांटाइन है. कोरोना संक्रमण के दौरान यह खुद को बचाए रखने का एकमात्र विकल्प है. पर दिक्कत ये है कि कुछ लोग इस क्वरांटाइन से भी तंग आ रहे हैं. इंसान मिलनसार प्राणी है. समाज के बिना उसका गुजारा संभव नहीं है. पर फिर भी खुद को जिंदा रखने की जद्दोजहद में हम सब एक-दूसरे से दूर हैं. फिर भले ही कितना ही अकेलापन महसूस हो रहा हो, पर ये जरूरी है. अब आज की ये जरूरत बहुत ज्यादा परेशान कर रही है तो आपको 350 साल पहले की एक घटना के बारे में जरूर जानना चाहिए. यह घटना "ग्रेट प्लेग ऑफ लंदन" के दौरान की है. जब एक गांव के लोगों ने महामारी को रोकने के लिए खुद को अपने आप ही क्वरांटाइन कर लिया था. यानि उस गांव ने मौत को अपने दरवाजे से बाहर नहीं जाने दिया. तो चलिए जानते हैं लंदन के पास बसे एक वीरान गांव एयम का किस्सा...
1665-66 की बीच इंग्लैंड ने भयानक प्लेग के कहर को झेला था. जब से दुनिया में कोरोना ने तबाही मचाना शुरू किया है, तब से प्लेग के उस दौर को कई बार याद किया जा चुका है. "ग्रेट प्लेग ऑफ लंदन" जिसके बारे में तमाम तरह की कहानियां कही गईं हैं, पर सबसे दर्दनाक और सीख देने वाली कहानी है एयम गांव की. एयम आज एक पर्यटक स्थल बन चुका है. ठीक वैसे ही जैसे हमारे राजस्थान का कुलधरा गांव. जहां एक वक्त में इंसानी बसाहट थी, खुशियां थीं, त्यौहार थे, मेले थे और फिर अचानक गांव ऐसे वीरान हुआ कि दोबारा बस नहीं पाया. एयम के वीरान होने की कहानी 350 साल पहले की है. यह गांव लंदन से तक़रीबन 3 घंटे की दूरी पर डर्बीशायर डेल्स जिला में है. इस गांव के बाहरी हिस्सों में अब भी 1 हजार से कम लोग रह रहे हैं पर जो मुख्य हिस्सा है वो प्लेग महामारी के बाद से पूरी तरह वीरान है. प्लेग ने 1665-66 में तकरीबन 14 महीनों तक इंग्लैंड के विभिन्न इलाकों, खासतौर पर लंदन और उसके इर्दगिर्द के क्षेत्रों में ख़ूब तबाही मचाई थी. सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, इस महामारी के वजह से 75,000 लोगों को जानें गंवानी पड़ी थी. हालांकि, कई इतिहासकार दावा करते हैं कि : 1 लाख से ज्यादा लोग मौत में मुंह में चले गए थे. खैर, किस्सा प्लेग के आंकड़ों का नहीं, बल्कि साहस का है. क्योंकि इस गांव ने अपनी जान पर खेल कर इस संक्रमण को फ़ैलने से रोका. अगर उस दौर में एयम गांव के लोगों ने पूरे गांव को क्वरांटाइन नहीं किया होता, तो शायद देश में इतनी मौतें होती कि उनकी गिनती नहीं की जा सकती थी.
सीखा खुद को क्वरांटाइन करना: जब पूरे लंदन में प्लेग फैल रहा था, तब कुछ समय तक एयम गांव सुरक्षित था. वजह ये थी कि लोग अपने गांव से कम ही बाहर जाया करते थे. लेकिन खतरे से बेखबर गांव का दर्जी अलेक्जेंडर हैडफील्ड लंदन पहुंचा, जहां से उसने कपड़े का थान खरीदा. वह नहीं जानता था कि जो थान खरीदा है वह प्लेग फैलाने वाले पिस्सू से संक्रमित है. थान गांव पहुंचा और उसकी दुकान में काम चलता रहा. पर हफ्ते के भीतर उस सहायक जॉर्ज विकर्स की मौत हो गई, जिसने बंडल को खोला था. हफ्तेभर के भीरत वह जिन-जिन लोगों से मिला थे, वे सभी संक्रमित हो चुके थे और धीरे-धीरे एक चेन तैयार हो गई. संक्रमण पूरे गांव में फैल गया. सितंबर से दिसंबर 1665 तक करीब 42 ग्रामीणों की मौत हो गई. 1666 की शुरूआत में लोगों ने गांव से बाहर निकलने की योजना बनाई. ताकि, बचे हुए लोग सुरक्षित रहें. हालांकि गांव के रेक्टर विलियम मोम्पेसन और निष्कासित पूर्व रेक्टर थॉमस स्टेनली ने ग्रामीणों को समझाया, कि ऐसा करना ज्यादा खतरनाक है. क्योंकि गांव के बाहर भी महामारी का प्रकोप है. अब उनके सामने बस एक ही रास्ता है कि वे खुद को कैद कर लें. वो भी कुछ इस तरह कि यह बीमारी आसपास के उन गांवों में ना फैले जहां तक अभी संक्रमण नहीं पहुंचा है. हालांकि, इस बलिदान के लिए गांव वालों को राजी करना इतना आसान नहीं था. बहुत समझाने के बाद अधिकांश ग्रामीण इस फैसले के लिए तैयार हो गए और जो तैयार नहीं थे वे गांव से बाहर निकल गए.
हालांकि, उनमें से कभी कोई लौटकर बाहर नहीं आया. खैर 24 जून 1666 को गांव के सारे रास्ते बाहरी लोगों के लिए बंद कर दिए गए. विलियम मोम्पेसन के ​कहने पर गांव के चारों ओर एक पत्थर की दीवार बना दी गई. जिसे आज भी "मोम्पेस्सन वेल" के नाम से जाना जाता है. इस दीवार में एक छोटा सा छेद रखा गया. जहां से गांव वाले चंद सिक्के बाहर फेंक देते थे और दूसरे लोग जो मदद करना चाहते थे वे इस छेद से खाने और दूसरी जरूरत की चीजें पहुंचा दिया करते थे. इससे महामारी गांव से बाहर तो नहीं गई पर गांव से भी नहीं गई. लोगों ने अपने घरों के भीतर ही जमीन खोदकर सुरंगें तैयार कीं. घर की महिलाएं और बच्चे इसी सुरंग में रहते, ताकि उन्हें जिंदा रखा जा सके. प्लेग से मरने वालों की लाशें गांव से काफी दूर जंगलों में दफनाई जानें लगी. अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में भी गांव वालों के जुटने पर रोक लगा दी गई. कोई अपने घर से बाहर नहीं निकलता था. चर्च बंद कर दिए गए, सभाएं खुले मैदान में होती थीं, जिसमें केवल जरूरी लोग ही शामिल होते थे. लोग मरते रहे, ताकि दूसरे जिंदा रहें : इतने कठिन नियमों के बाद भी गांव में मौत का सिलसिला जारी रहा. क्योंकि संक्रमण गांव के भीतर ही था. संक्रमण का सबसे विकराल रूप अगस्त 1666 में दिखाई दिया. जब गांव में एक दिन के भीतर 5 से 6 मौते होने लगी. ऐसा कोई घर नहीं था, जहां किसी का शव ना हो. इतिहास में एक औरत का जिक्र है. जिसका नाम था एलिजाबेथ हैनकॉक.
इस महिला ने केवल 8 दिन के भीतर अपने पति और 6 छोटे मासूस बच्चों को दम तोड़ते देखा. उस औरत के दुख की कल्पना भी नहीं की जा सकती. कहा जाता है कि लोग इतना डरे हुए थे कि कोई उसकी मदद के लिए आगे नहीं आया. तब भी नहीं, जब वह अकेले कब्र खोदती थी. लोग गांव की पहाड़ी स्टोनी मिडल्टन पर खड़े होकर बस देखते रहते थे. एलिजाबेथ रोज अपने घर से एक लाश घसीट कर लेकर आती, रोज कब्र खोदती और उन्हें दफनाती. धीरे-धीरे संक्रमितों की संख्या इतनी ज्यादा हो गई कि गांव के अधिकांश परिवार ही खत्म हो गए. पर इन सबने धैर्य का साहस दिया और बीमारी को दूसरे गांव तक फैलने नहीं दिया. मोम्पेसन ने अपनी डायरी में लिखा है कि, वह दौर बहुत भयानक था पर ग्रामीणों का अपने ईश्वर में इतना ज्यादा विश्वास था कि वे मौत से घबराए नहीं. वे भागे नहीं, डटे रहे, ताकि बाकी दुनिया सुरक्षित रहे. हजारों मौत के बाद सितंबर-अक्टूबर में संक्रमण के मामले कम होने लगे और फिर 1 नवम्बर को यह बीमारी अचानक गायब हो गई. पर इस दौरान एयम ने अपने आधे से ज्यादा परिवार खो दिए. सरकारी दस्तावेजों की मानें तो एक साल के भीतर गांव के 76 परिवारों के 260 लोगों की मौत हुई थी. जबकि उस वक्त गांव की कुछ आबादी 800 से भी कम थी. महामारी का प्रकोप खत्म हो जाने के बाद भी एयम गांव के लोग खुद को क्वरांटाइन रखने के आदि हो चुके थे, या यूं कहें कि वे डरे हुए थे. कई सालों बाद लोगों ने खुद को बाहर निकालना शुरू किया और फिर धीरे-धीरे करके मुख्य गांव खाली हो गया. आज एयम एक पर्यटक स्थल बन चुका है. जहां लोग प्लेग के भयानक प्रकोप और दर्दनाक कहानियों को महसूस करते हैं. हम आज जिस क्वरांटाइन को जी रहे हैं यह उस क्वरांटाइन से लाख दर्ज बेहतर है जो 350 साल पहले एयम गांव के लोगों ने भोगा था. इसलिए खुद को कैदी ना समझें, बल्कि ये मानें कि आपका घर पर रहना दुनिया को सुरक्षित रखेगा.

हौजरानी प्रेस एन्क्लेव में बन सकता है फ्लाईओवर: 50 हजार से ज्यादा लोगों को जाम से मिलेगा छुटकारा

दिल्ली वालों को बड़ी राहत मिलने वाली है। साकेत मैक्स अस्पताल के बाहर पंडित त्रिलोक चंद शर्मा मार्ग पर लगने वाले जाम से जल्द मुक्ति मिलेगी। प...